प्रकृति क्या है.
पृथ्वी पर) जल .थल. व वायु. के अंतर्गत आने वाली सभी वस्तु ही प्रकृति है!
इसको हम दो भागों में विभाजित कर सकते हैं ( प्रकृति के बारे में)
1 जीव प्रकृति....
2 निर्जीव प्रकृति.....
1(जीव प्रकृति.)
मुख्यतः तीन प्रकार की होती है!
1 जलीय जीव प्रकृति.
2 थलीय जीव प्रकृति.
3 आकाशय जीव प्रकृति.
1. जलीय जीव: वह जीव!जो जल में विचरण करते हैं. जैसे मछली कछुआ मगरमच्छ व सारे जल में विचरण करने वाले जीव! जो प्रकृति के अंतर्गत ही आते हैं!
2.थलीय जीव प्रकृति: व जीव! जो पृथ्वी के थल पर विचरण करते हैं!(यानी जमीन पर) जैसे पशु व मनुष्य और जितने भी कीड़े मकोड़े सांप वह बाकी सारे जीव! यह भी प्रकृति के अंतर्गत ही आते हैं!
3.आकाशय जीव प्रकृति: व जीव! जो हवा में विचरण करते हैं. जैसे कि सारे पक्षी. यह भी प्रकृति के अंतर्गत ही आते हैं.
2 (निर्जीव प्रकृति.)
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| प्रकृति की परिभाषा |
वैसे तो धरती की हर वस्तु प्रकृति के बंधन से मुक्त नहीं है! लेकिन प्रकृति की हर वस्तु की अपनी एक जगह होती है अपनी एक पहचान होती है! (वास्तव में निर्जीव प्रकृति ही प्रकृति का वास्तविक रूप है)
जीव प्रकृति का संरक्षण. निर्जीव प्रकृति ही करती है. यानी प्रकृति का वास्तविक रूप निर्जीव प्रकृति है!
वास्तविक प्रकृति क्या है?
"वास्तविक प्रकृति यानी (प्रकृति)
वैसे तो प्रकृति का वर्णन कोई नहीं कर सकता लेकिन.. हम अपने आप को प्रकृति से अलग हो कर सोचे तो हमारे चारों ओर ही प्रकृति है. अगर हम अपने शरीर को अपना माने तो बाकी सारी जरूरतें हमें प्रकृति ही मुहैया करवाती है! जैसे कि खाना पीना. कपड़े. मकान .हवा .पानी. इंधन .प्रकाश .पेड़ पौधे .इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम .व दवाइयां .इत्यादि!
लेकिन प्रकृति बदले में हमसे भी कुछ आशा रखती है. कि हम उसका संतुलन बनाए रखें. क्योंकि हमारा निर्माण यानी हर जीव जंतु का निर्माण ही प्रकृति के संरक्षण के लिए हुआ है.जैसे कि निर्जीव प्रकृति ने ही जीव प्रकृति को जन्म दिया है. इसलिए हमें प्रकृति के संतुलन में सहायक होना चाहिए!
मानव को छोड़कर बाकी सारे जीव तो अपना काम कर रहे हैं! लेकिन मनुष्य अपनी जिम्मेवारी से हमेशा ही भागता आया है! ऐसा नहीं है कि कुछ महापुरुषों ने प्रयास नहीं किया है! लेकिन हमें प्रकृति के महत्व को समझना चाहिए
प्रकृति के सबसे बड़े सहायक जीव जंतु ही है! क्योंकि वह अपनी गतिविधियों से प्रकृति का संतुलन बनाए रखते हैं! जैसे कि शिकारी जीव छोटे जीव जंतुओं का शिकार कर लेते हैं! जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहता है! साहाकारी जीव. घास फूस खाते हैं जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहता है! वैसे ही जल में रहने वाले जीव जैसे मगरमच्छ मछलियों का शिकार करता है और बड़ी मछलियां छोटी मछलियों का शिकार करती है इस प्रकार से वह जलीय प्रकृति का सरंक्षण करती है! जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहता है. लेकिन जो रास्ता प्रकृति ने उन्हें बताया वो उसी रास्ते पर चल रहे हैं! उन्होंने अपना रास्ता नहीं बदला! लेकिन इन सब सबसे महान व बुद्धिमान जीव है (मनुष्य) जिसने सबसे ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया! और बदले में प्रकृति को कुछ नहीं दिया! जिसका दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम हमारे सामने है! (जैसे कि ओजोन परत में छिद्र होना. जब बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है यह ओजोन परत हमें सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों से बचाती है जो एक प्राकृतिक घटनाक्रम पर आधारित है! ओजोन परत में छिद्र होने का जिम्मेवार भी मनुष्य है! क्योंकि जितना वायु प्रदूषण होगा उतना ही यह छिद्र बड़ा होता जाएगा!
प्रकृति का सरंक्षण कैसे करें.
देखिए दोस्तों इस विशाल प्रकृति के सरंक्षण का दायित्व हम सब पर ही हैं और यह आवश्यक भी है! सबसे पहले तो हमारे मन में यह विचार आने चाहिए कि हम अपनी प्रकृति को प्रदूषण से कैसे बचाएं! और यह सोच एक राजनेता से लेकर एक आम आदमी तक की होनी चाहिए! प्रदूषण यानी वायु प्रदूषण जल प्रदूषण थल प्रदूषण.....
1 वायु प्रदूषण.
मुख्यतः वायु प्रदूषण का कारण कार्बन डाइऑक्साइड गैस ही है! लेकिन इसमें और भी गैसों का महत्वपूर्ण योगदान! और यह गैस गाड़ियों से और बड़े बड़े कारखानों से निकलती है प्रकृति को तो इसका नुकसान होता ही है! लेकिन इसका प्रभाव मानव जीवन पर भी पड़ता है! जैसे-जैसे विज्ञान तरकी कर रहा है वैसे वैसे इन गैसों का प्रभाव भी हमारे वायुमंडल में बढ़ रहा है! तो क्या करें? हमें विज्ञान में भी तो आगे बढ़ना है! अब यह दोनों काम एक साथ कैसे हो सकते हैं? बिल्कुल हो सकते हैं. यह हमारी सोच पर निर्भर करता है. अगर हर इंसान यह सोच ले कि उसकी वजह से किसी प्रकार का वायु प्रदूषण हो रहा है! तुम मुझे 1 या उससे ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए! मतलब कि तुम जितना ज्यादा प्रदूषण कर रहे हो उतने ज्यादा पेड़ लगाओ! इस प्रकार हम प्रकृति का सरंक्षण कर सकते हैं!
2जल प्रदूषण.
मेरे हिसाब से जल प्रदूषण का दोषी भी मनुष्य को हि ठहराना चाहिए! क्योंकि इसमें भी मनुष्य को छोड़कर बाकी जीवो की भागीदारी नहीं है. जैसे-जैसे हानिकारक गैसों का प्रभाव पृथ्वी पर बढ़ रहा है वैसे-वैसे पृथ्वी का तापमान भी बढ़ रहा है. और इससे बरसाती कालचक्र में असंतुलन पैदा होना जैसे कि कहीं पर सूखा तो कहीं पर बाढ़ का आना. ग्लेशियर का पिघलना. समुंद्री जीव जंतु का विनाश होना. इत्यादि प्रमुख है!.
लेकिन इससे भी विकट समस्या यह है. जल को स्थलीय भाग पर गंदा किया जा रहा है प्रदूषित किया जा रहा है! जैसे कि बड़े बड़े कारखानों का गंदा नाला स्वच्छ पानी की नदियों में जोड़ दिया जाता है! कुछ देशों में तो पूरे शहर की गटर लाइन समुंदर से जोड़ी जा रही है! जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है निंदनीय है! वैसे भी हम ग्रामीण लोग भी जल प्रदूषण प्रक्रिया में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं! तालाबों को गंदा कर ना. वहीं पर अपनी भैंसों को नहलाना और वहीं पर धोबी घाट बना लेना कम से कम ग्रामीण स्तर पर हमें जल प्रदूषण रोकना चाहिए! और इस प्रकार हम प्रकृति का संरक्षण कर सकते हैं
3 थल प्रदूषण (मृदा प्रदूषण)
मर्दा पृथ्वी की ऊपरी परत होती है. जो किसानों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है और किसान संपूर्ण मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण है. क्योंकि समस्त संसार किसान की उगाई फसल से ही अपनी भूख मिटाता है! इसलिए प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए मृदा सरंक्षण बहुत जरूरी है! इस विषय पर सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए! और हम सब को भी इसमें बढ़-चढ़कर भागीदार बनना चाहिए! इस प्रकार हम प्रकृति का संरक्षण कर सकते हैं
हमारे लिए प्रकृति का महत्व.
हम पूरी तरह प्रकृति पर ही निर्भर है अगर हमें स्वच्छ श्वास लेने के लिए हवा चाहिए वह भी हमें प्रकृति ही मुहैया करवाती है! पीने के लिए शुद्ध जल चाहिए तो वह भी प्रकृति ही मुहैया कराती है! सर्दी में धूप और गर्मी में छांव के लिए भी हम पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है! भूख मिटाने के लिए खाद्य पदार्थ ही प्रकृति ही उत्पन्न करती है। इसलिए हमारे जीवन में प्रकृति का सबसे ज्यादा महत्व है लेकिन अनादर भी हम इसका ही सबसे ज्यादा करते हैं! इसके लाखों रूप है हम रोज किसी न किसी रूप का अनादर करते हैं। इसलिए हे मानव प्रकृति ही ईश्वर है इसके लाखों-करोड़ों रूप है! हमें इसके हर रूप की पूजा करनी चाहिए. इस संसार में हमारा अस्तित्व करोड़ों वर्ष पहले से है. और तब से लेकर अब तक अगर हमें प्रकृति का सरंक्षण नहीं प्राप्त होता. तो हमारी सभ्यता ही मिट जाती. कभी-कभी मानव सभ्यता का विनाश भी हुआ है. लेकिन इसका भी एक प्रमुख कारण हो सकता है और वो यह"की प्रकृति के विरुद्ध जाकर किया गया कार्य! जब तक हम प्रकृति के विरुद्ध ना जाएंगे तब तक प्रकृति हमें कभी नुकसान नहीं पहुंचाएगी!
मनुष्य प्रकृति की सबसे समझदार संतान है इसलिए मनुष्य को इसके बारे में ज्यादा सोचने की आवश्यकता है. और एक सच्चाई यह भी है. प्रकृति का संशोधन भी तो मनुष्य ही ज्यादा करता है. इसलिए प्रिय मित्रों हमें ईश्वर रूपी अपनी प्रकृति का ख्याल रखना चाहिए!
(आज ही आपको एक शपथ लेनी चाहिए)
तो आइए हम सब मिलकर एक शपथ लेते हैं!
मैं ईश्वर की शपथ लेता हूं (लेती हूं)
कि मैं अपने जीवन में हर वर्ष
एक पेड़ लगाऊंगा (लगाऊंगी)
वह उस पेड़ की 1 वर्ष तक
पूर्णतया जिम्मेदारी के साथ
देखभाल करूंगा (करूंगी)
और यह काम मैं अपने पूरे जीवन
करता रहूंगा (रहूंगी)
(हे परम दयालु प्रकृति आप की सदा ही जय हो)
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| हमारी शपथ( प्रकृति का सौंदर्य) |
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